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लेखक संगठनों को जनता के प्रति जवाबदेह बनना होगा' : दलेस अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी
September 30, 2020 • डाटला एक्सप्रेस

 

दिनांक 26 सितंबर को दलित लेखक संघ (दलेस) का आठवाँ अधिवेशन सत्र ऑनलाइन संपन्न हुआ| इस अवसर पर दलेस द्वारा तैयार स्मृतिशेष कथाकार कैलाश चंद चौहान पर प्रतिबद्ध पत्रिका का पुस्तक रूप में प्रकाशित विशेषांक का लोकार्पण किया गया| अधिवेशन के विशेष पक्ष के तौर पर दलेस का घोषणापत्र जारी करना था| यह घोषणापत्र संचालक डॉ. गुलाब सिंह ने पढ़ा| मैनीफेस्टो में वर्चस्ववादियों के पेचीदे संजाल को समझने और उसे ध्वस्त करने के लिए नयी रणनीति बनाने पर ज़ोर दिया गया है| इसमें लिखा गया है कि जाति का प्रश्न जेंडर, धर्म और वर्ग के प्रश्न से जुड़ा हुआ है| डॉ.आम्बेडकर की वैचारिकी और उनके पूर्ववर्ती विचारकों के चिंतन से दिशा लेकर सम्पूर्ण समता के लक्ष्य की ओर अग्रसर होना दलेस का इरादा है|

       कार्यक्रम का आरंभ राजेन्द्र राज के गाए गए एक जनगीत- "कब कटेगी बैरन रतिया कब कटेगी हो... 

हो दादा कब कटेगी हो हो जीजी कब कटेगी हो..." से हुआ| 

     इस अधिवेशन में एक विचारगोष्ठी का आयोजन भी हुआ| गोष्ठी का विषय था 'लेखक संगठनों के समक्ष चुनौतियाँ'|  इस गोष्ठी में दलेस से जुड़े वक्ताओं के अतिरिक्त सहयोगी संगठनों के लेखक भी आमंत्रित किए गए थे| जनसंस्कृति मंच (जसम) की तरफ से अपनी बात रखते हुए डॉ. आशुतोष ने कहा कि दलेस का घोषणापत्र आश्वस्तकारी और उत्साहवर्धक है| आज की सत्ता को फासीवादी सत्ता बताते हुए उन्होंने कहा कि इन दिनों सच और झूठ का अंतर ही नहीं मिटा है, बल्कि झूठ को ही सच बना दिया गया है| दिल्ली दंगों और भीमा कोरेगाँव के संदर्भ से उन्होंने कहा कि जो शांति और इन्साफ की अपील कर रहे थे वे अपराधी ठहरा दिए गए हैं और जेल में हैं जबकि असली अपराधी शासन-प्रशासन संभाल रहे हैं|

प्रलेस की तरफ से फरहत रिजवी ने कहा कि लेखक संगठनों के बीच इस दौरान चुनौतियाँ बढ़ी हैं| ये चुनौतियाँ भीतरी हैं और बाहरी भी| आज  एक-से मकसद वाले लेखक संगठनों में यूनिटी की जरूरत है| उनका कहना था कि हमें नयी स्ट्रेटजी के साथ जनता के बीच जाना है| इस संकटकाल में मजलूमों, छात्रों और किसानों को संगठित करने के लिए खुद हमें संगठित रहना बहुत जरूरी है| उन्होंने प्रलेस के उन प्रयासों का जिक्र किया जिनमे जन जुड़ाव था|

      जलेस की तरफ से अपनी बात रखते हुए बजरंग बिहारी ने कहा समाज की चुनौतियाँ ही लेखक संगठनों की चुनौतियाँ हैं| भारतीय समाज में प्रगतिशील आंदोलन ने कार्यकर्ता-रचनाकार/ एक्टिविस्ट-राइटर को जन्म दिया| प्रगतिशील लेखकों के पहले अधिवेशन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा हमें प्रेमचंद की बातों को बार-बार याद करना होगा| सभी समानधर्मा लेखक संगठनों में एका बने और साझे मंच पर हम मजबूती से प्रतिरोध की ताक़त व न्याय की आवाज के रूप में डटे रहें, यह आज की मांग है| संगठन में व्यक्ति के हावी होने का मतलब है उद्देश्य में भटकाव|

       न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव की तरफ से आये प्रसिद्ध विचारक सुभाष गाताडे ने कहा कि आज का निजाम मात्र कारपोरेट के समर्थन से नहीं चल रहा है| उसे जनता के एक बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त है| हमें इस पहलू को भूलना नहीं है| हमें अपनी ताकत को जानते-बूझते हुए आगे बढ़ना है| आज जो भी अलग आवाज रखते हैं उन्हें हमले झेलने पड़ रहे हैं| वे अगर आंबेडकर को हड़प रहे हैं तो हमें असली आंबेडकर को सामने लाना है|

        दलेस की ओर से आलोचक डॉ. मुकेश मिरोठा ने लेखक का आंदोलनधर्मी होना आवश्यक बताया| उनका ज़ोर इस बात पर था कि जिन लोगों ने दलितों, वंचितों की पीड़ा नहीं जानी उन्हें इससे अवगत कराया जाना चाहिए| जो समान स्तर पर आकर संवाद करते हैं, सम्मान करना जानते हैं उनसे सघन संवाद होना चाहिए| घोषणापत्र की तारीफ़ करते हुए उन्होंने कहा कि हमें इसके अनुरूप एक वर्ष का कार्यक्रम चलना चाहिए|

        प्रलेस के अली जावेद ने कहा कि दलित साहित्य नई चेतना का साहित्य है| प्रो. तुलसीराम के लेखन को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि हमें साझे मंच को और मजबूत करना होगा| सत्ता लेखकों को, विचारकों को डरा रही है लेकिन हमें निडर होकर अपनी लड़ाई जारी रखनी है| मायूसी का माहौल तोड़ा जाना जरूरी है|

      जलेस के संजीव कौशल ने कहा कि हम आंतरिक चुनौतियों से मुँह न चुराएं| यह लेखकों की हत्याओं का दौर है| हम बेरोजगारी की बात करें, नयी शिक्षा नीति पर बहस करें तो सत्ता की, शासन की हकीकत सामने आएगी|  उन्होंने नए लेखकों को वैचारिक रूप से प्रशिक्षित करने पर जोर दिया| कार्यप्रणाली में पारदर्शिता न होने पर भटकाव की आशंका है- इसे उन्होंने रेखांकित किया|

          वरिष्ठ दलित लेखक प्रो. धर्मपाल पीहल ने कहा कि हम सबसे बुरे दौर में हैं| संघ और भाजपा ने लोकतांत्रिक, संवैधानिक मूल्यों को नष्ट कर दिया है| हमें उससे टकराना पड़ेगा| उन्होंने लेखकों के दायित्व को राजनेताओं के दायित्व से बड़ा बताया| दलित लेखक संघ के अध्यक्ष हीरालाल राजस्थानी ने कहा कि लेखक संगठनों को अपनी जिम्मेदारियों के प्रति संजीदा होकर जनता के प्रति जवाबदेह बनना होगा| आगे

साझे प्रयासों की महत्ता पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि 2015 में डॉ. एम.एम. कलबुर्गी की हत्या के बाद हम सभी संगठनों ने मिलकर विरोध करने, प्रोटेस्ट मार्च करने का निर्णय किया| तब से यह एकता मजबूत होती गई है| उसके बाद गौरी लंकेश की हत्या, कांचा इलैया शेफर्ड पर हमले के समय सभी समानधर्मा संगठन जंतर मंतर और अन्य जगहों पर इकट्ठे हुए तथा अपनी प्रतिरोधी आवाज़ उठायी| संगठन के भीतर के असंतोष के मुद्दे पर  उनका कहना था कि वास्तविक समस्या का समाधान मिल बैठकर सुलझा लेना चाहिए लेकिन मध्यवर्गीय वैयक्तिक महत्त्वाकांक्षाओं को हवा नहीं देनी चाहिए| हिन्दुत्ववादी बाबा साहेब की बड़ी मूर्ति लगवाकर हमें लुभा तो सकते हैं लेकिन सम्मान-प्रतिष्ठा नहीं दिलवा सकते| हमें इस तरह के लोकलुभावने कार्यों से भ्रमित होने से बचना है|

 

       कार्यक्रम के आरंभ में दलेस की महासचिव डॉ. पूनम तुषामड़ ने पिछले वर्षों में संगठन के तमाम कार्यक्रमों व प्रकाशनों का विस्तार से ब्योरा देते हुए कहा कि इस कार्यकाल में दलेस का मुखपत्र प्रतिबद्ध को सुचारू रूप से नियमित निकाला गया| संचालक डॉ. गुलाब ने बताया कि शीघ्र ही  दलित लेखक संघ की संगोष्ठी होगी जिसमें नवीं कार्यकारिणी का गठन किया जाएगा| कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. मुकेश मिरोठा ने घोषणापत्र की तारीफ करते हुए कहा कि हमें इसके अनुरूप साल-साल भर के कार्यक्रम तय करके चलना चाहिए। विशेष उपस्थिति में विमल थोराट, संजीव कुमार, राम नरेश, सर्वेश मौर्या, चंद्रकांता सिवाल, जगदीश पंकज, शीलबोधि, श्रीलाल बौद्ध, जावेद आलम, धीरज कुमार सिंह, आलोक मिश्रा, टेकचंद, रवि प्रकाश, कुसुम सबलानियां, वेद प्रकाश और सुनीता राजस्थानी की रही|