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बेजान रिश्ते
September 23, 2020 • डाटला एक्सप्रेस

 

चाहें तुम कुछ भी कर डालो

अब रिश्तों में जान नही है ।

अगल-बगल रहने वालों की

बिल्कुल ही पहिचान नही है ।।

 

गाँव छोड़कर शहर आ गए

खुद को सभ्य कहाने को ।

इतने सभ्य हो गए बिल्कुल

समय नहीं घर जाने को ।।

अम्मा बप्पा तरस रहे हैं

पर भइया को ध्यान नहीं है । चाहें तुम कुछ -------------

 

दूर -दूर गाँवों से आकर

बस्ती एक बसाई है ।

शहर सभ्यता के संवाहक

दुनिया कहती आई है ।।

नाम ,पते ,पदवी सब कुछ पर

नेक एक इंशान नहीं है । चाहें तुम कुछ---------------

 

भाव शून्य संवेग हो गये

कौन किसी का होता है ।

रिश्ते पीछे छूट गए पर

पैसा आगे होता है ।।

अगर ज़रूरत पड़ जाये तो

कोई भी धनवान नहीं है । चाहें तुम कुछ------------

 

एकाकी जीवन चर्या ने

नहीं कहीं का छोड़ा है ।

रिश्तों के अविरल प्रवाह को

गलत दिशा में मोड़ा है ।।

परम्परायें शिथिल सभी पर

नूतन अनुसंधान नही है । चाहें तुम कुछ---------------

 

बूढ़ी पीढ़ी छुपी घरों में 

रह-रह कर अकुलाती है ।

जैसे दबी कीच में मछली

बिल्कुल चैन न पाती है ।।

पंथ प्रदर्शक यही हमारे

लेकिन अब सम्मान नहीं है । चाहें तुम कुछ--------------

 

                        अनिल कुमार पाण्डेय

                 प्रदेश अध्यक्ष-उगता भारत प्रबुद्व जन मंच

                  ए-265 आई टी आई संचार विहार , मनकापुर

                  गोण्डा (उ प्र) शब्ददूत-9198557973