रू-ब-रू (दयानिधि महासंग्रह 2018 से
July 16, 2019 • Datla Express

 

राजेश्वर राय
10/05/2018 /ग़ाज़ियाबाद

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महल जिनके हों ऊँचे वो डरें घुट-घुट के वो जीयें
मैं बेघर ज़लज़लों से बर्क़ से क्यूँ ख़ौफ़ खाऊँगा
राज(सफ़र....से)

प्रिय मित्रों....!

मैं 'राज' राज राजेश्वर आपको हृदय की गहराइयों से नमस्कार एवं आपका अभिनंदन करता हूँ। तमाम मरहलों (मंज़िलों) से गुज़रते, साहित्यिक रवायतों को तोड़ते और ज़माने से क़दम मिलाते हुए आज आपकी दुआओं से 2016 के बाद पुनः मुख़ातिब हूँ; अपने इस *"दयानिधि अब तो लो अवतार....! महासंग्रह 2018"* के माध्यम से। जैसा कि आपको विदित ही है कि इसके पहले छ: वर्षों में चार संग्रहों के कुल 800 (आठ सौ) पदों के साथ आपके सामने बार-बार लगातार आता रहा हूँ। ये आप दोस्तों की बेपनाह मोहब्बत, इनायत, हमदर्दी और दुवाओं का ही असर है कि आज मैं इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए यहाँ तक पहुँच पाया हूँ।
इस अवसर पर मैं अपनी मातृभूमि भारतवर्ष, स्वर्गवासी माता-पिता (श्री पारसनाथ ब्रह्मभट्ट एवं मुखना देवी),बड़े भाई स्व० चंद्रशेखर जी (जिनका जुलाई 2015 में असमय देहांत हो गया,जो कि परिवार के लिए एक बड़ा सद्मा था), हमारे मुँह बोले भाई स्व० अमृत सिंह जी,अपने पूर्वजों,जन्मभूमि (गाँव-काशीपुर,पोस्ट - चेंवता, जिला-आज़मगढ़,उत्तर प्रदेश),शिक्षकों,शिक्षण संस्थानों,बचपन के मित्रों (भुटुल्ली, नक्कू, सुभाष, लौटन यादव, श्रीभागवत इत्यादि), मार्गदर्शक श्री संग्राम राय जी,अपनी मुसाफ़रत,ग़म,ग़ुस्सा, ज़माने की हिक़ारतों,बेरोज़गारी,बीमारी,
शिकस्त,भय-भूख-भावुकता, दोस्तों-सखियों-सरपरस्तों-बुज़ुर्गों-मुर्शिदों-पासबानों को तहेदिल से शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिनकी वज़ह से ही मैं और मेरी ये रचना/कृति "दयानिधि अब तो लो अवतार....!" निरंतर समृद्ध होती गयी, तथा इसी के साथ ही अपने प्रशंसकों,आलोचकों,पाठकों,श्रोताओं,कवि मित्रों एवं निंदकों का भी आभार प्रकट करना चाहूँगा जिन्होंने किसी न किसी रूप में हमें प्रेरणा दी। अगर बाअल्फ़ाज़े दीगर (दूसरे शब्दों में) कहूँ तो अगर इन सबको मेरी शख़्सियत से निकाल दिया जाये तो न हमारी कोई हैसियत बचेगी और ना ही मेरी रचनाओं की। प्रिय मित्रों! आज इस मौक़े पर आपसे काफ़ी बातें करने को जी चाह रहा है; लेकिन ज़्यादा नहीं तो कुछ बातें ज़रूर करना चाहूँगा, क्योंकि ये हमारी आदत जो ठहरी, और ये भी तो है कल हम हों न हों ये बातें ही तो रह जायेंगी, आख़िर इनके बिना मेरी किताब तो कम से कम पूरी नहीं हो सकती। तो हो जायें कुछ दिल की बातें.........

आत्म पारिचय
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दोस्तों...! आज इस 'दयानिधि अब तो लो अवतार...! महासंग्रह 2018' को आपके दस्तेमुबारक में सौंपते हुए
मैं अपना संक्षिप्त परिचय भी देना चाहूँगा। ईश्वर के बनाये अलिखित निज़ाम (शासन व्यवस्था) के तहत
जैसा कि सर्वविदित है कि हर व्यक्ति कहीं न कहीं अवश्य पैदा होता है,सो मैंने भी ग्राम-काशीपुर, चेंवता (जो उत्तर प्रदेश के जिला-आज़मगढ़ में स्थित है) में पाँच अप्रैल उन्नीस सौ सरसठ(05/04/1967) को जन्म लिया। हमारा जन्म एक भारद्वाज गोत्रीय ब्रह्मभट्ट ब्राह्मण परिवार में हुआ। पिता श्री पारसनाथ जी एक कृषक और नामचीन नज़ूमी (ज्योतिषी) थे और माता मुखना देवी एक धार्मिक, घरेलू परन्तु दबंग महिला थीं, परिवार में उनका कड़ा अनुशासन और वर्चस्व चलता था। मुझे अपनी जननी-जन्मभूमि-जाति पर सदैव गर्व रहता है क्योंकि ये हमें जन्मना मिली हैं और सबको होना चाहिए। प्राइमरी (कक्षा 5) तक मैंने नज़दीक के गाँव कादीपुर से,आठवीं चेंवता से,दसवीं तेरही (कप्तानगंज) से,इंटरमीडिएट (बारहवीं) और बी.एस-सी.(एजी.) चण्डेश्वर,आज़मगढ़ और एम.एस-सी(एजी.)1989 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। मुझे अपने जन्म स्थान काशीपुर एवं ननिहाल तथा ससुराल कोंहणा, जिला-अम्बेडकर नगर (उत्तर प्रदेश) से बेहद लगाव है। मैं उसे एक क्षण के लिए भी भूल नहीं पाता। मेरी हर शब (रात) और सहर (सुबह) उन्हीं की याद में गुज़रती है, मैं आज तक चाहकर भी अपनी जन्मभूमि काशीपुर, वहाँ के समाज और अपनी जाति के लिए कुछ भी नहीं कर सका, जिससे हमेशा यही सोचता हूँ कि क्या ये जीवन इस जज़्बे को लिए ही मुल्के अदम (स्वर्ग) को चला जायेगा, लेकिन कभी-कभी ये ख़्याल भी आता है कि जब समय आयेगा तो सारी चीज़ें ख़ुद-ब-ख़ुद हो जायेंगी।

मेरा बचपन
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मेरा बचपन बहुत शानदार रहा, मैंने कभी कोई अभाव नहीं देखा। इसके लिए मैं ईश्वर, अपने भाग्य और स्वर्गवासी पिता श्री पारसनाथ एवं माता मुखना देवी जी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। मैं अपने बाल सखाओं की यादों से कभी मुक्त नहीं हो पाया, अन्य ऐसे कई लोग हैं जो हमें आज भी शिद्दत से याद आते हैं, आखिर किन-किन के नाम गिनाऊँ। कभी-कभी लगता है जैसे कि वो दफ़ातन (यकायक) मेरे सामने आ गये हों और मैं उनसे दिल की ढेर सारी बातें बेतकल्लुफ़ी से करते हुए उसी बचपन में पहुँच गया हूँ जहाँ से जीवन शुरू हुआ था। हमारे कुलदेवता हनुमान जी के मंदिर (इसे हमारे फौजी चाचा स्वर्गीय विश्वनाथ राय जी ने बनवाया है) के पुजारी स्व.रामराज तिवारी और पंडित अंशदीन जी से हमने धर्म और अध्यात्म की शिक्षा पाई। स्वास्थ्य के प्रति चेतना श्री रामचंदर शास्त्री जी ने जगाई। संगीत में रुचि बाबा जानकी प्रसाद और बाबू (चाचा) जे. एन. राय ने पैदा की। हर परिस्तिथियों में हँसते रहने और ख़ुश रहने के गुर मैंने ताऊ सूबेदार राय उर्फ 'तिवारी जी' और चाचा दयाशंकर राय जी से सीखा। ये हमारे जीवन के बुनियाद की वो ईंटें हैं जो आज भी मुझमें जीवन के प्रति अनुराग और सकारात्मकता पैदा करती हैं, प्रेरणा देती हैं, और हमारा मार्ग भी प्रशस्त करती हैं। और इस दुनिया के सुन्दर होने का एहसास करवाती हैं।

क्षमाप्रार्थी
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प्रिय पाठकों, मित्रों....! हमारी इस "दयानिधि अब तो लो अवतार....!" की यात्रा (नवंबर 2011, गरिमा गार्डन, ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश से शुरू) में अगर मुझसे किसी भी प्रकार की कोई चूक हुई हो तो मैं उसके लिए आप सब से क्षमाप्रार्थी हूँ, या यूँ कहूँ कि यदि कहीं जाने-अनजाने मेरी इस रचना से कहीं भी,किसी की लैंगिक,
धार्मिक,जातिगत,क्षेत्रीय,राजनीतिक,सामाजिक,व्यावसायिक,भाषिक, खान-पान, पहनावा या अन्य कोई भावना आहत हुई हो तो वो हमें नादान समझकर माफ़ करे, और यदि वह हमें आगाह करे तो और भी ख़ुशी होगी,बल्कि मैं यहां तक कहता हूँ कि यदि वह हमें हमारे फोन नंबरों 8800201131 या 9540276160 पर फोन करके, पत्र लिखकर, सोशल मीडिया में या स्वयं मिलकर अपना ग़ुस्सा और ऐतराज ज़ाहिर करे तो भी कोई उज़्र (आपत्ति) नहीं होगा, बल्कि मैं उसकी तजवीज़ और ऐतराज का स्वागत करूँगा और आइंदा उसे सुधारने की पूरी कोशिश करूँगा।

मेरी लेखन शैली
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मित्रों...! यदि मैं अपने तल्ख़ परन्तु सत्य व्यंग्यों के बारे में अपना पक्ष रखूँ तो वो ये है कि सत्य सुंदर होता है,शाश्वत होता है, लेकिन इसी के साथ-साथ मेरा ये भी मानना है कि ऐसा सत्य किस काम का जो फ़िज़ाओं में ज़हर घोल दे,ज़िन्दगियों को तबाह कर दे,सारा बना-बनाया निज़ाम (व्यवस्था/शासन) दरहम-बरहम कर दे, तो मैं ऐसे किसी सत्य का हामी नहीं हूँ, इसका ध्यान मैंने अपनी इस रचना में बख़ूबी रखा है कि अतिरेक या शेखी में कहीं
उद्दंडता, अनुशासन हीनता या अप्रिय सत्य बोलने का पाप न हो जाये, परंतु साथ ही उन बातों से,शब्दों से कतई परहेज़ नहीं किया जो उसी शास्त्रीय रूप में,उन्हीं शब्दों में यदि नहीं कही जायें तो उनका कोई मायने और असर नहीं होगा। अगर इस क्रम में भी कोई त्रुटि हुई हो तो मैं आप पाठकों को कोई तर्क-कुतर्क देने के बजाय क्षमा माँगना ज़्यादा मुनासिब समझूँगा,क्यूँकि आप मुंसिफ़ (न्यायाधीश) हो, आपका फ़ैसला सर्वोपरि है। वैसे भी मैं किन्हीं तथाकथित विद्वानों, मर्मज्ञों, विश्लेषकों, समीक्षकों या ज्ञानियों के लिए लिखता भी नहीं, मैं आप आम पाठकों के सामने उनके अस्तित्व तक को नकारता हूँ। यहाँ अपनी एक शे'र कहना चाहूँगा जो ज़्यादा मौज़ूं है.......

मैं अपनी सोच का शागिर्द हूँ उस्ताद क्यूँ रक्खूँ
मेरा अपना पयाम है, मेरा अपना मुक़ाम है
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दयानिधि अब तो लो अवतार...! कृति के संबंध में
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दयानिधि के मायने
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दोस्तों...! सबसे पहले इस शब्द 'दयानिधि' का मायने बताना आज आवश्‍यक हो गया है, क्योंकि अक्सर मुझसे कई लोग पूछ बैठते हैं और कई जानते हुए भी आश्वस्त नहीं होते कि आखिर दयानिधि के असल मायने क्या हैं। तो बताना चाहूँगा कि 'दयानिधि' दो शब्दों 'दया' और 'निधि' से मिलकर बना हुआ है, जिसके मायने क्रमशः ये हैं, दया का मतलब करुणा/कृपा और निधि का अर्थ ख़ज़ाना होता है, सो इस प्रकार 'दयानिधि' के शाब्दिक मायने हुआ "दया का ख़ज़ाना(कोष/ट्रेजर) ", और दुनिया में केवल एक ईश्वर ही है जो दया का ख़ज़ाना है, सो इस तरह यह परमात्मा का ही एक पर्यायवाची शब्द है। इसी संबोधन को आधार बनाकर हमने अपनी बात ज़माने से कहने की कोशिश की है।
इसके लिए हमने गीता के उन श्लोकों को आधार बनाया है, जिसमें महाभारत की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण (दयानिधि) अर्जुन (पार्थ) से कहते हैं कि.............

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

भावार्थ:हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं धर्म के उत्थान हेतु अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप में लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ।
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परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

भावार्थ: साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करनेवालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।

ठीक इसी बात को ध्यान में रखते हुए मैंने इस पुस्तक की सिग्नेचर ट्यून (पंच लाइन) *'दयानिधि अब तो लो अवतार...!'* रखी है, और मैंने उन्हीं की कही बात (प्रतिज्ञा/अहद/प्रॉमिस) को उन्हें (दयानिधि जी को) ही बार-बार याद दिलाने की कोशिश की है,यह कहकर कि.....

पाप बढ़ा जब-जब धरती पर आये बारंबार
एक बार फिर इस धरती को है तेरी दरकार
दयानिधि अब तो लो अवतार....!

समाज की कड़वी सच्चाइयों का तज़किरा (चर्चा) करके, उनका तफ़सील से विवरण देकर या यूँ समझें कि प्रभु के पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करवा के उनसे यानि दयानिधि (ईश्वर) से अवतार लेने की प्रार्थना मैंने अपने हर पदों में बार-बार लगातार की है।

एक समानांतर इतिहास
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उपर्युक्त सारी बातों के साथ-साथ यह पुस्तक कुछ हद तक एक समानांतर इतिहास भी है। ऐसे कुछ पद जिन्हें मैंने वर्तमान सामाजिक,राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर लिखा है वो पद कुछ समय बीतते ही थोड़ा नीरस,अप्रासंगिक और बेमतलब ज़रूर लगेंगे लेकिन कुछ समय बाद वे इतिहास के दस्तावेज़ों में शामिल हो जाएंगे और अति चाव से उदाहरण के रूप में पढ़े जाएंगे,उन पर चर्चा होगी,उनका विश्लेषण होगा और शायद वो सराहे भी जाऐं, ऐसा मेरा विश्वास है।
इसी दूरदर्शिता को ध्यान में रखकर मैंने इस प्रकार के कुछ पदों की रचना को अंजाम दिया है,साथ ही आगे इसे डायरी के रूप में भी लिखने की योजना है,जिससे यह कृति (दयानिधि....) मेरे साथ और मेरे बाद भी हास्य-व्यंग्य और संवेदना के साथ-साथ एक साहित्यिक और तारीख़ी (ऐतिहासिक) दस्तावेज़ के रूप में भी देखी जाए। देखते हैं,हमारी इस सोच और प्रयास को कितनी सफलता मिलती है।

दयानिधि की भाषा:
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हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी,हिंग्लिश,भोजपुरी, अवधी,नेट,गॅवईं के साथ-साथ शब्दों के संक्षिप्त रूप एवं कहावतों से लेकर मेरे अपने गढ़े हुए कुछ शब्दों का मिश्रण है दयानिधि की भाषा। मैंने ऐसे कई शब्दों का इस्तेमाल इरादतन किया है,जो लगभग अब प्रचलन से बाहर हैं,ये उनकी पुनर्स्थापना और उन्हें पुनर्जीवन देने की कोशिश है। अपनी आंचलिक भाषा को वर्तमान व् अगली पीढ़ी तक पहुँचाने और संसार को पैगाम देने के लिए मैंने गर्वपूर्वक अवधी और भोजपुरी में पदों की रचना की है।
रोज़-ब-रोज़ चलन में आ रहे तमाम नये शब्दों, जुमलों का खुले दिल से स्वागत करने के साथ-साथ मैंने इसमें लगभग साहित्य के हर रस का बार-बार और जमकर प्रयोग किया है, जिससे ये पद पठनीय और ग्राह्य बन सकें। न मैंने आलिम-फ़ाज़िल बनने की कोशिश की, न किसी स्थापित मानदंड या प्रतिमानों की परवाह की, बस वही लिखा जो मुझे पाठक और श्रोता के रूप में स्वयं को अच्छा लगता, सो मैंने अपने फक्कड़पन को इन पदों में मरने नहीं दिया। अब मुझे आप दोस्तों की प्रतिक्रिया से ये यक़ीन हो गया कि मैं सही था। मैं इन दयानिधि पदों को भारी शब्दों, बिंबों, शिल्पों, अलंकारों इत्यादि में लपेट कर एक बीमारी बनाने के बजाय छोटी-छोटी सरदर्द नाशक गोलियां बनाना चाहता था। अब इसका छ: वर्षों में 800(आठ सौ)पदों के साथ चार भागों का सफ़र और आप दोस्तों का निरंतर प्यार यह साबित करता है कि मैं अपने मक़सद में कुछ तो ज़रूर कामयाब रहा। इसके अतिरिक्त सामान्य ज्ञान का भी हमने इसमें भरपूर इस्तेमाल किया है या स्वाभाविक रूप से होता गया है ऐसा भी कह सकते हैं। परिस्थितियों की चर्चा,विश्लेषण के अलावा मैंने इसमें हर वर्ग के सशक्तिकरण और अन्याय के प्रति आवाज़ उठाने का भी कार्य किया है। बाकी असली फैसला तो आप पाठकों की ही अदालत में होता आया है और होना भी है,देखते हैं आपकी क्या प्रतिक्रिया आती है। दोस्तों! अब आते हैं अपने थोड़े से मुसाफ़िरत के दौर पर, जिसमें क़शमक़श, जंग और उससे उबरने के रास्तों की खोज शामिल है..... ये बातें कुछ इसलिए भी कि पता नहीं फ़िर कब वक़्त मिले, मिले या ना मिले सो अभी ही कर लेते हैं, तो आइये आपको रू-ब-रू कराते हैं अपने.....

अतीत के अंधेरों से आज के उजालों तक
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प्रिय मित्रों....!

आखिर मैं अपने किन-किन दुःखों-दर्दों- नाक़ामियों और उपलब्धियों की चर्चा आपसे करूँ। वहां,जहाँ हर आदमी मुझसे ज़्यादा दर्दमंद, दौलतमंद, दानिश और दरिद्र है,मैं तो बस उन स्वार्थी लोगों की फ़ेहरिस्त (लिस्ट) में अपने आप को सबसे ऊपर पाता हूँ,जो अपनी इस पुरपेंच ज़िन्दगी के तमाम ग़मों से निजात पाने के लिए अपनी कुछ दिली बातों को आपसे बाँटकर अपने मन की मैल और मलाल कुछ हद तक कम करने की जुगत में रहता है। सवाल मेरे कवि और शायर होने का है तो उसके बारे में सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि.........

ताल - मात्रा - छंद - बंद का हमने पाका ना पाला,
उरू - गुरु ना रक्खा ना इसलाह कराने का झाला,
जो दुनिया में देखा-भाला-समझा-सुना-सटीक लगा-
उस पर ही दो सत्तर टूटा - फूटा हमने लिख डाला,
जो मन में उमड़ा-घुमड़ा गोंजा-गांजा हूँ काग़ज़ पर-
ना मैं लासानी लेखक ना हूँ मैं कविताकार।
दयानिधि अब तो लो अवतार...!

दोस्तों! अपने पिछले तमाम अनुभवों से हमने यह सीखा कि अगर हम अपने प्रति ईमानदार, सकारात्मक, निरंतर परिश्रम करनेवाले और आशावादी हैं तो धन, पद, रसूख़ और शारीरिक बल न्यूनतम होने के बावजूद भी अपने भय, संदेह और नाकामी पर तात्कालिक बढ़त अवश्य बना लेते हैं। जीवन की जंग को जीतने के लिए हम सबको अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में बड़े और छोटे संघर्ष झेलने ही पड़ते हैं। संघर्षों की स्थिति में जब परिणाम निश्चित न हो, तब भी काम करते रहना पड़ता है,दूसरों को माफ़ करना पड़ता है और अपने को ही चुनौती देनी पड़ती है। सोग (दर्द) तो शख़्स का सनातन साथी है,अतः इसके अहसास को ही ख़ारिज कर देना चाहिए। क्योंकि इसके अस्तित्व को ख़ारिज करना मुमकिन नहीं है। वैसे यह इतना आसान नहीं है,लेकिन मुश्किल भी नहीं है,इसके बंधन से मुक्त होने की प्रक्रिया में आत्मोत्सर्ग के मार्ग पर चलकर ही मैं जीवन को एक बेहतर मुकाम पर ला पाया, न चाहते हुए भी यह कहना पड़ रहा है कि जब 26 जनवरी 2014 को मुझे सीरियस हॉर्ट अटैक आया और मेरे हृदय की लगभग तीन नसें सौ प्रतिशत ब्लॉक पायी गईं। 01 फरवरी को दो स्टेंट(नलिका) पड़ने और एक नस की सफ़ाई के उपरांत मैं ज़िन्दा बच गया। मैं उस दुःस्वप्न से उबरना चाहता था,क्योंकि मैं अपने शेष जीवन में अब भय को कतई स्थान नहीं देना चाहता था। शुरू-शुरू में तो मैं काफ़ी विचलित हुआ,परंतु बाद में यह आत्मज्ञान हुआ कि दर्द ज़िन्दगी का उतना ही अहमतरीन हिस्सा है,जितना कि सुकून,अतः इसे अलग करके जीवन को देखना और जीने की कल्पना करना बेमानी है। इस प्रकार मैंने इन्हें अपना साथी बना लिया और जीवन को एक नई दिशा मिल गई, मेरे दर्दों ने मेरी रचनाओं के लिए इतना कच्चा माल मुहैया कराया कि मैं आबाद हो गया, अगर दूसरे अल्फ़ाज़ों में बयान करूँ तो.....

मेरे गीतों से इनको बेदख़ल करना है नामुमकिन
वजह, दर्दों ने मेरे दिल में जो पनाह ले ली है

अब आगे बढ़ते हुए कहना चाहूँगा कि ऐसी स्थिति और परिस्थिति में मैंने अपने प्रत्येक दिन को पहले से अधिक उत्सव की तरह जीने का निर्णय लिया और हर दिन को जीवन का अन्तिम दिन मानकर जीने लगा, अत: इस जीवन को सुंदर से सुंदरतम बनाने का हर क्षण प्रयास किया और आज भी कर रहा हूँ, और परिणाम आपके सामने है। मेरी सकारात्मक सोच का ही असर है कि 2014 के बाद दयानिधि पदों का सफ़र भी तेजी से बढ़ा और पत्रकारिता भी संतोषजनक कर पा रहा हूँ। मैं हर दिन क़रीब दस से बारह घंटे बिला नागा काम करता हूँ और अगले दिन के लिए अपनी तमाम शारीरिक तक़लीफों को ख़ारिज़ करते हुए फिर उसी ऊर्जा के साथ तैयार रहता हूँ। ज़िन्दगी के प्रति सिर्फ़ शिकायत का ही रवैया रखनेवालों से मुझे सख़्त नफ़रत है, उनके लिए अपनी एक शे'र का उल्लेख यहाँ करना चाहूँगा................

हसरत से देखो दुनिया बाहों में उठा लेगी
ना जाने यहाँ कितने, मिलने के बहाने हैं
है दर्द यहाँ ज़्यादा, तो प्यार कहाँ कम है
कौओं के शोर में भी कोयल के तराने हैं
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मेरे शौक,कमज़ोरियाँ और ताक़त:
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(अ) मेरे शौक़:

मुझमें बचपन से लेकर आज तक साहित्य,संगीत,फोटोग्राफी फिल्में और नॉनवेज खाने के प्रति बेपनाह दीवानगी रही जो समय के साथ बढ़ती ही गई। संसार की हर भाषा का साहित्य, विशेषकर रसियन और हर तरह का संगीत मुझे प्रिय है। इनकी मुसलसल (लगातार) तलाश मैं करता रहता हूँ। कितनी भी व्यस्तता हो मैं संगीत सुनने का मौक़ा निकाल ही लेता हूँ, कारण ये है कि यह मेरे लिए एक थिरैपी और औषधि है। मुझे शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह का खाना बनाने और उसे दोस्तों-रिश्तेदारों को खिलाने का बेहद शौक़ है,आतिथ्य सेवा में मुझे बड़ी ख़ुशी मिलती है। बीच में पाँच वर्षों तक मैंने नॉनवेज़, सिगरेट, शराब सबको अलविदा कह दिया था, लेकिन इधर दो सालों से थोड़ा नॉनवेज़ मैं अपनी नीरसता को ख़त्म करने और दोस्तों की मेहमाननवाज़ी के लिए ले लेता हूँ। 01 फरवरी 2014 को एंजियोप्लास्टी के बाद से सिगरेट पूरी तरह छोड़नी पड़ी, जो बहुत तक़लीफ़देह रही, क्योंकि स्मोकिंग की बड़ी बुरी लत थी मुझे, मैं गोल्ड फ्लेक्स (इसके अलावा पूरी दुनिया की कोई सिगरेट मुझे पसंद नहीं आई) की दो पैकेट सिगरेटें (10 का पैकेट) प्रतिदिन, वर्षों बिला नागा पीता रहा, सो कभी-कभी बड़ी तड़प ज़रूर होती है, लेकिन दोबारा मजबूरी-डर-इच्छाशक्ति जो कहिए, के कारण नहीं छूआ, चलो जी किसी भी कारण एक अच्छा काम तो हुआ। मुझे सजने-संवरने और हर नये फ़ैशन को लेकर बेहद दीवानगी रहती है। अपने दाँतों-बालों की हज़ार जान से हिफ़ाज़त करता हूँ। पार्क एवन्यू पर्फ्यूम मुझे हमेशा से अतिप्रिय रहा। जीवन में वैसे तो ऐसी नौबत नहीं आयी कि मेरे दरवाजे 'नौबत' बजती, लेकिन मैं अपनी सकारात्मकता की वजह से एक साफ़-सुथरी और शानदार ज़िन्दगी न्यूनतम उपलब्धियों की स्थिति में भी हमेशा अधिकतम सुन्दरता से जीता रहा हूँ और जो आज भी क़ायम है, जिसमें इस चीज़ का कोई स्थान नहीं कि मुझपे क्या नहीं है, बल्कि उस बात का ज़्यादा महत्व है कि मुझपे क्या है। मेरा मानना है कि जीवन को सुंदर या विद्रूप बनाने में धन का कोई स्थान नहीं है यह सोच से संचालित होता है।

(ब) मेरी कमज़ोरियाँ:

मुझे ड्राइविंग करनी नहीं आती और लाख चाहकर भी मैं खेलों में कभी कोई रुचि नहीं पैदा कर सका,हाँ ये जरूर रहा कि मैं स्वास्थ्य के
प्रति हमेशा सजग रहा।
मुझे बहुत जल्द ही क्रोध आ जाता है,जिसकी वजह से मैं अक्सर अपना ही नुक़सान करवा लेता हूँ। कम्प्यूटर प्रैक्टिकल ज्ञान हमारा शून्य है। यात्राओं से बहुत जी चुराता हूँ। थोड़ा कमी तो आयी है लेकिन बहुत अॉयली-स्पाइसी खाने से अभी भी ख़ुद को नहीं रोक पाता। बेसमय सोने की बुरी आदत है, परंतु यही मेरा ऊर्जा स्रोत भी है।

(स) मेरी ताक़त:

मैं किसी भी काम को पूरी तरह करता हूँ या तो नहीं करता हूँ। जब भी कोई रचना लिखता हूँ तो उसे अपना पहला प्रयास ही मानता हूँ, और उसके हर पहलू पर बार-बार रिसर्च करता हूँ। मुझे किसी से भी कुछ पूछने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। हर पल मैं नया सीखने में लगा रहता हूँ,चाहे वो जीवन का कोई भी क्षेत्र हो। मैं अपने सारे रिश्तों को संभालने की शिद्दत से कोशिश करता हूँ, मैं किसी को तब तक नहीं छोड़ता जब तक कि वो मुझे न छोड़कर चला जाये। अतिशय क्रोध की स्थिति में (जो लोगों के झूठे व्यवहार के कारण हो जाता है) यदि मैं कोई भी बद्ज़ुबानी कर देता हूँ तो मुझे माफ़ी माँगने में कोई शर्म और हिचक कभी नहीं होती। मैं अपनी सोच,वाणी,व्यवहार और लेखन में एक जैसा ही हूँ,इसीलिए अपने लेखन में पूर्णतया पारदर्शी। ये मेरा अभिमान है। मैं लिखते समय ये सोचता हूँ कि...

बताना है कुछ तो हक़ीक़त बयां कर-
ये झूठी दलीलें कहाँ मानती है,
दुनिया से तू क्या छुपाता है नादां-
ये तुमसे भी ज़्यादा तुम्हें जानती है।

दोस्तों...! आप ये सोच रहे होंगे कि इन बातों को पढ़ाकर आख़िर मैं क्या जताना चाह रहा हूँ, तो उसका जवाब भी दिये दे रहा हूँ, वो ये है कि यदि मेरे रहते या न रहने पर आप हमारी रचनाओं को कभी पढ़ें तो हमारी ज़हनियत से भी वाक़िफ़ हों। जिससे मेरा किरदार साफ़ रहे, दूसरा तो आधा-अधूरा बतायेगा। इसमें मेरे द्वारा ख़ुद मुझे ही अमर करने की ग़र्ज़ शामिल है। अत: अपनी इस स्वार्थपरता के लिए आप दोस्तों से क्षमा प्रार्थी भी हूँ। वैसे बहुत सारी कही-अनकही बातें अभी भी हैं जिन्हें फिर कभी साझा करेंगे।
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मेरा जीवन दर्शन:
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मेरी तरबियत (संस्कार) ने मुझे इस तरह का बना दिया, जहां मुझमें उचित के पक्ष में खड़े होने की ज़िद और विद्रोही स्वभाव का जन्म हुआ, जिससे मैं अपनी बात कहने और अपने निर्णयों पर क़ायम रहने में आज तक पीछे नहीं हूँ। मेरे इस स्वभाव को आज तक न तो मुझसे बुरी से बुरी परिस्थितियाँ छीन पायीं और ना ही कोई शख़्स चाहे वो कितना ही कद्दावर क्यूँ न रहा हो। अपनी अलग राह बनाने, अपनी मंज़िलें और प्रतिमान ख़ुद तय करने का मैं आदी हूँ। मैं न तो किसी का हाथ था, न हूँ और न कभी कोई हमें अपना हाथ बना सकता,ये मेरा अहंकार है तो अहंकार ही सही। मेरा किरदार हमेशा साफ़ रहा है। या तो मैं किसी के साथ हूँ या नहीं हूँ। न मैं किसी के आगे चलता हूँ, न अपने पीछे चलाता हूँ, न पीछे चल सकता हूँ, और न आगे चलने देता हूँ,मैं तो बस साथ-साथ चलने का हामी हूँ।
वैसे दुनियाबी गुणा-गणित के अनुसार तो मैं एक सफल व्यक्ति नहीं माना जा सकता,क्योंकि यहाँ की रवायतों के मुताबिक मुझ पर ढेर सारी भौतिक चीज़ों और ओहदों (पद) की कमी है। लेकिन मैं ये जानता हूँ कि मैं नाक़ामयाब आदमी कतई नहीं हूँ। अमीर और क़ामयाब किसे कहते हैं मुझे नहीं पता और ना ही मुझे जानना है,मुझे तो बस इतना ही पता है कि मैं ग़रीब नहीं हूँ। मेरी ज़िन्दगी में इतनी मोहब्बत,सुंदरता,दोस्ती और चाहने वालों की आमद है कि मैं हमेशा अपने आपको दौलतमंद इंसान समझता हूँ, ये मन को बहलाने की नहीं बल्कि अंतिम सच्चाई की बात कर रहा हूँ,जिसे मुझे जानने वाला हर शख़्स तस्दीक कर सकता है। माँ शारदे की अनन्त कृपा मुझ पर है, जो मुझे अमरत्व के मार्ग पर निरंतर अग्रसर किये हुए है। ये उसी माँ की कृपा और हमारे अनन्त विश्वास का परिणाम है कि मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ तब दिया जब मैं हर तरफ़ और तरह से पायमाल (टूटना) हो चुका था। यदि थोड़ा और जीवन मिल गया तो वक़्त की रेत पर कुछ तो निशान ज़रूर छोड़ जाऊँगा। यदि मेरी ये बातें असत्य और कृतिम हैं तो फिर वेद, पुराण, गीता,रामायण, बाइबल, जेंदअवेस्ताँ, त्रिपिटक, गुरूवाणी की वो सारी बातें भी ग़लत हैं जहाँ मानवीय प्रेम और ज्ञान को सर्वोपरि माना गया है। मैं पिता-पृथ्वी-प्रकृति-पत्नी-पानी-पूर्वजों के साथ-साथ जहाँ उस माँ का विशेषरूप से ऋणी हूँ जिसने मुझे नौ महीने अपने उदर में रखा और मुझे ज़िन्दा रखने और क़ामयाब बनाने की हर मुमकिन कोशिश की तथा तमाम मुफ़लिसी (ग़रीबी) से हमें बचाकर रखा, वहीं मैं भारत माँ का भी उतना ही क़र्ज़दार हूँ जिसकी गोद में मैं अपनी हर साँस लेता हूँ। मुझे नहीं लगता कि मैं इस ऋण से कभी मुक्त हो पाऊँगा। मैंने इन सभी लोगों से जितना लिया है उसके बदले इन्हें कुछ नहीं लौटा सका हूँ। सो हमें किसी से कोई शिकायत नहीं रहती। मित्रों मैं यहाँ अपनी वो प्रार्थना आपसे साझा करना चाहूँगा जो हमें निरंतर शक्ति देती है और हमारे कई मित्रों को भी हमेशा मार्ग दिखाती आई है, उनमें से एक गीतकार धीरज श्रीवास्तव जी हैं, जो अक्सर कहते हैं कि राय साहब मैंने इसे कम से कम 100(सौ) बार अवश्य पढ़ा होगा, ये प्रार्थना मुझे हर बार राह दिखाती है जब कभी भी मैं ग़म-ग़ुरबत या ग़ुस्से में होता हूँ। यही मुझे भी परिभाषित करने के लिए पर्याप्त है। तो लीजिए आप भी उसका मुतालया (अध्ययन / पाठ) कीजिए.......
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*जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ*
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ठहरना न शामिल है,फ़ितरत में मेरी-
मैं आब-ए-रवां हूँ बहे जा रहा हूँ,
जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ...

हर वक़्त जारी है जारी रहेगी-
हमेशा ही मैदान में जंग के हूँ,
हर युद्ध जीवन का मैं ख़ूब डटकर-
बड़े ही हृदय से लड़े जा रहा हूँ.
जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ...

थके पाँव मेरे ग़मों के वज़न से-
मगर मेरा संघर्ष अब भी है जारी,
फ़ुर्सत मिली ना कभी बैठने की-
सफ़र में अभी भी खड़े जा रहा हूँ.
जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ...

विजयश्री भले मेरी संदिग्ध ही हो-
मगर जीतने की तलब है बक़ाया,
दग़ा दे गई जिस्म की क़ौत बेशक़-
मगर हौसले से अड़े जा रहा हूँ.
*जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ...

शिकायत नहीं मुझको भगवान से है-
अदावत नहीं मुझको इंसान से है,
ज़माने का भी शुकिया है कि उससे-
सबक़ आये दिन मैं पढ़े जा रहा हूँ.
जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ...

मंज़िल का भ्रम ख़ूबसूरत है कितना-
कि ग़म रास्तों का पता ही न चलता,
शिखर छूने वाली तमन्ना लिए मैं-
निरंतर ही पर्वत चढ़े जा रहा हूँ
*जीवन सफ़र में बढ़े जा रहा हूँ...
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सफलता-विफलता
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मैं जब भी विफल होता हूँ तो स्वयं को तुच्छ समझने की बजाय,अपनी बची ऊर्जा,ख़ूबियों,बीते दिनों की सुन्दर यादों, दोस्तों और अपनी तक़दीर पर ख़ुश होने की कोशिश करता हूँ। इसी का परिणाम है कि मैं हर समस्या का समाधान निकाल लेता हूँ। माना कि मुझमें बेशुमार कमज़ोरियाँ, ग़लतफ़हमियाँ और ख़ुदआशिक़ी (आत्ममुग्धता) हो सकती है,मेरे कई फ़ैसले और कभी-कभी मेरी ज़ुबान अपने अस्तित्व और अहंकार की रक्षा के लिए आमानवीय और निर्दयी हो सकती है,परंतु ये मेरे चरित्र का हिस्सा बिल्कुल नहीं है। मैं प्रेम और मुस्कान को ही जीवन मानता हूँ,शायद इसीलिए इस संसार में मैंने सबसे प्रेम पाया है और इसके (रिश्तों) कारण जो खोया उसका ग़म नहीं होता। जिनको मुझसे हिर्स (जलन/घृणा) है, तो मैं यही कहूँगा कि ये उनकी ख़ुद की एक बड़ी समस्या है मेरी नहीं, क्योंकि जो मुझसे नहीं निभा पाया वो शायद किसी से नहीं निभा पायेगा। जीवन की कई विफलताओं ने हमें ईश्वर के प्रति विश्वास रखने और संसार व् समय के प्रति श्रद्धा रखने की नसीहत दी, या यूँ कहें कि मुझे धर्मभीरू/पोंगापंथी बनाने की बजाय धार्मिक बनाया और ख़ुदा के निज़ाम (शासन व्यवस्था) में यक़ीन करना सिखाया। इस सारी कवायद में धन का प्रभाव और अभाव इतना देखा कि जीवन जीने की कला भी विकसित कर ली। हमने पाया कि जीवन एक टूटे हुए जहाज की तरह है लेकिन हमें जीवन रक्षक नाव की उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। महान उद्देश्यों में हार भी छोटी-छोटी जीतों से बुलंद (ऊँची) होती है। मेरे जीवन में अब सिर्फ़ कर्म का स्थान है, सफ़लता-असफ़लता कोई मायने नहीं रखती। बाक़ी अपने से ज़्यादा दूसरों के बारे में चिंता करनेवाली ये दुनिया हमारा हिसाब-किताब रखती रहे परवाह नहीं, जब मैं उससे अपने लिए चरित्र प्रमाणपत्र माँगू तब न।

मेरे लिए कविता
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किसी भी समय के मुक़ाबले हमें कविता की ज़रूरत आज कहीं ज़्यादा है। हमें कविता से प्राप्त होने वाले दुष्कर सत्य की ज़रूरत है,उस दुनिया में जहां बंदूकों की होड़ लगी हुई है,और इस उन्माद को पोषता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ़ हमारा पक्ष,हमारा धर्म और हमारी राजनीति ही सही है। दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुकी हुई है,हमें उस आवाज़ की ज़रूरत है,जो हमारे भीतर के सर्वोच्च को संबोधित करे,हमें उस आवाज़ की ज़रूरत है जो हमारी ख़ुशियों से बात कर सके,जो हमारे बचपन,निजी एवं राष्ट्रीय स्थितियों के बंधन,हमारे सन्देहों,हमारे भय और उन सभी अकल्पित आयामों से भी बात कर सके जो न केवल हमें मनुष्य बनाते हैं,बल्कि हमारा होना भी बनाते हैं।
बस इसी बात को मैंने अपने *"दयानिधि अब तो लो अवतार...!" के माध्यम से कहने की कोशिश की है,जिसमें चिंता के साथ चिंतन भी है,परंतु हँसी जो दर्द का मरहम है,वो इसमें सर्वोपरि है। बचपन में अपने हनुमान मंदिर में बाबा जानकीदास के साथ अपने हम उम्र चाचाओं शारदा प्रसाद,माता प्रसाद, कोलई,बिल्लर और छोटे भाइयों मीतू,पवन कुमार के साथ प्रसाद की लालच में प्रार्थना करते,गाँव की रामलीला में पाठ अदा करते,नौटंकी-पचगुइयाँ-कँहरवा नाच देखते, दसवीं कक्षा तक मॉनिटर बनते,बाल सभाओं में भाग लेते,कॉलेज एवं विश्वविद्यालयी छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाते, हमने हर जगह कविता ही पायी और यह कब हमारी रूह में समा गयी पता ही नहीं चला। कविता मेरे लिए उतनी ही स्वाभाविक है जितना कि साँस लेना,चलना,खाना,हँसना,
सोना और सहवास करना। जीवन और मृत्यु के बीच जो कुछ है वो सब दैनंदिन क्षण कविता ही तो है। कविता तो मेरी रगों में लहू बनकर रवां है। इसके बिना मेरा जीवन बेनूर है। अपनी इसी अनुभूति को तो मैं आप तक उसी स्थिति में बिना चाँदी का वर्क (पन्नी/काग़ज़) लगाये पहुँचाने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं अपनी कविताओं को न तो भारी भरकम व्याकरण का शिकार होने देना चाहता और ना ही कुतर्की एवं छिन्द्रान्वेषी ज्ञानियों की मनहूस नज़रों में आने देना चाहता जो निंदा और स्तुति इरादतन करते हैं, जो दुरभि संधि के तहत अपना गिरोह चलाते हैं। इन्होंने ही कविता और भाषा दोनों का विनाश किया है, ये निरंतर प्रतिभाओं को कुंद करने के खेल में शामिल रहते हैं।
मैं चाहूँगा कि मेरी कविताओं में जो भी है, जितना है केवल उसी की चर्चा हो,जो नहीं है उसकी कतई नहीं। मैं अपनी कविताओं को दुराग्रही ज्ञानमार्गियों की बजाय जनता जनार्दन को सौंपना चाहूँगा, जिसके बराबर कोई न्यायाधीश इस जहान में नहीं है। वो जो चाहे करे मुझे स्वीकार होगा।

मेरा संतोष-
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मित्रों! मैंने अपनी इन छ: वर्षों की साहित्यिक साधना में जो किया,जैसा किया और जितना किया,उससे ज़्यादा और उससे अच्छा नहीं कर सकता था। मैं सोते - जागते,उठते-बैठते,खाते-पीते और यहाँ तक कि नींदों-ख़्वाबों और अस्पताल के बिस्तर पर भी अपने इस काम से एक पल के लिए भी कभी ग़ाफ़िल नहीं हुआ,या यूँ कहूँ तो यही कार्य अपने जीवन का मैंने सम्पूर्ण रूप से पूरे समर्पण,भाव और भक्ति के साथ बिना किसी फल की इच्छा के किया। अतः यह संतोष ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है। परंतु साथ ही एक बात और भी है,वो ये कि तमाम जिस्मानी तक़लीफों के बावजूद अगर ये क़ौत मुझमें बनी रही तो मैं इसे ईश्वर की कृपा और आप दोस्तों की मोहब्बतों का नतीज़ा मानता हूँ,उसी ईश्वर ने मुझे इस कार्य के लिए चुनकर और शक्ति देकर मेरे डूबते जीवन को अमृत से भर दिया, उसको शतत् नमन। अपनी रचनाओं और इस साहित्यिक जीवन पर सिर्फ़ इतना ही कहूँगा कि.......

फ़क़ीरों में शामिल हूँ, पर फ़ख़्र ये है-
मेरे गीत - ग़ज़लों की आवाज़ गूँजी,
नहीं कुछ सिवा पास है इनके मेरे-
यही मेरी पूजा, यही मेरी पूँजी।
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हानि-लाभ:-
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लोग अक्सर मुझसे सवाल करते हैं कि आखिर आपको इस कविता लेखन से क्या फ़ायदा है, अब उनके नज़रिये से 'फ़ायदा' की परिभाषा क्या है,ये तो वही जाने, लेकिन मेरा जवाब ये है कि अपने इस लेखन कार्य से मेरे जीवन को कोई 'अर्थ' मिला या नहीं ये तो मैं नहीं जानता,लेकिन ये ज़रूर लगता है कि जीवन व्यर्थ नहीं गया। कुछ उफ़नती उम्र की ग़लतियों की वजह से जो दर्द मिले उनसे उबरने के लिए हमने शराब जैसी जोखिम भरी दवा का सहारा लिया और उस जाम के झाम में ऐसा फँसता चला गया कि जीवन बद् से बद्तर होता गया। उस स्थिति में इस क़लम ने ही हमें सहारा दिया और नशाख़ोरी छोड़ने तथा अपने तमाम अवसादों पर फ़तह पाने में मेरी मदद की और मुझे निर्वाण के रास्ते पर अग्रसर किया। आखिर इससे बड़ा और क्या फ़ायदा हो सकता है। और अब तो ये लगने लगा है कि मैं अपनी लिगेसी (वसीयत) में सदियों के लिए ये कवितायें ही छोड़ जाऊँगा जो लोगों के दिलों में क़ायम दुनिया तक ज़िन्दा रहेंगी। तो आप ही बताइए इससे ज़्यादा और क्या लाभ हो सकता है।

इश्क़ - मोहब्बत:-
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मेरे लिए इश्क़ कभी देह से ऊपर का मामला नहीं रहा। मैं आसक्त तो हो सकता हूँ आशिक़ नहीं,शुकर है मैं इसका कभी न शिकार हुआ और ना ग़ुलाम। न ये मेरी ज़रूरत रही न कमज़ोरी। अगर कहीं ऐसा होता तो शायद मेरे जैसे निहायत जज़्बाती और जुनूनी आदमी के लिए बड़ा घातक होता। वैसे जो कुछ कभी रहा भी,उसमें मैं ख़ुद कभी ना ईमानदार रहा ना वफ़ादार,या ऐसे भी कह सकते हैं कि मैं कभी समर्पित प्रेमी
कतई नहीं रहा। मुझे प्रौढ़ और गर्भवती औरतें बचपन से बेहद पसंद रहीं। अगर सत्य कहूँ तो मैं प्यार के लिए बिलकुल बना ही नहीं। बावजूद इसके भी मेरी प्रेम कविताएं अच्छी होती हैं,क्योंकि मेरा मन प्रेम, संवेदना और करुणा से पूरी तरह भरा हुआ है। मुझमें जज़्बात भी बेपनाह हैं,लेकिन मैं अत्याधिक क्रोध और घमंड के कारण कभी प्यार-मोहब्बत के चक्कर में नहीं पड़ा। ऊपर से ख़ुद की स्वतंत्रता इतनी प्रिय है कि मैं प्रेम में पड़कर इसे कभी गँवाना नहीं चाहा,क्योंकि इश्क़ बहुत ही समय-सरमाया (धन) और समर्पण माँगता है। मेरे जीवन में मोहब्बत के बहुत हसीन मौक़े आए और बाख़ुदा अब भी आते ही रहते हैं परन्तु ज़्यादा हद तक मेरी तुनकमिजाज़ी ही मुझे एक अच्छा प्रेमी बनने से हमेशा महरूम रखी। मेरा मानना है कि प्रेम, प्रेम है वो जब होता है तो हो ही जाता है , यह उम्र और विवाहित होने का मोहताज नहीं है।

मेरी प्रेरणा
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मैं अपनी प्रेरणा ख़ुद हूँ, मैं आज तक किसी से भी प्रभावित नहीं हुआ। ये सत्य है कि मैं लिखने से ज़्यादा पढ़ने पर समय देता हूँ, पर जितना पढ़ता हूँ उतने के बारे में यही सोच होती है कि कम से कम अब यह मुझे नहीं लिखना है। दो लाइनें कहूँगा......

ना ग़म ना ऐश-ओ-इशरत सीख देती मुझको औरों की
हमारे पास ख़ुद यादों की अच्छी ख़ासी क़ान है
किसी की झंडाबरदारी से हमको क्या भला लेना
हमारा अपना परचम है, हमारा ख़ुद निशान है

(सफ़र...... से)

मुझे लगता है कि सारी क़ायनात मुझमें हर घड़ी करवट ले रही है, हर किरदार और एहसास मुझमें शामिल है। मैं कभी राम हूँ तो कभी रावण मुझ पर हावी है। सो मुझे कुछ भी खोजने बाहर नहीं जाना पड़ता, क्योंकि विचारों के सातों समन्दर मुझमें ही जो उफान ले रहे हैं। मेरी उग्र आदर्शवादिता, कुछ नया करने की तृष्णा और अभिमान भी मुझे किसी के भावों-विचारों से प्रभावित होने की इजाज़त नहीं देते। लोगों द्वारा किसी एक को गुरू बनाना मुझे बड़ा हास्यास्पद लगता है, आख़िर ये मुमकिन कैसे है। गुरू तो पूरा जगत् है, कब कौन आपको कोई सीख दे जाये क्या पता, अतः मैं ऐसी किसी गुरू परंपरा को सिरे से ख़ारिज़ करता हूँ जो किसी की सोच और उसके मन-मस्तिष्क को रेहन (गिरवी) रख ले। वैसे भी आजकल 'गुरुओं' का चरित्र काफ़ी संदिग्ध हो गया है।

फेसबुक फ्रैंड
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मैं फेसबुक की दुनिया को आभासी कहने वालों से सख़्त एतराज रखता हूँ। ये बड़ी शानदार दुनिया हैं, इसने हमारे तमाम अरमानों को परवाज़ (उड़ान) दिया, ढेर सारे दोस्त दिये, मेरी कविताओं को जन-जन तक पहुँचाया, मेरे अख़बारों (ट्रू टाइम्स एवं डाटला एक्सप्रेस) का प्रचार-प्रसार किया, नये व्यापारिक-सामाजिक रिश्ते दिये, हमारी तमाम तन्हाइयों का साथी बना, नये विचारों और दुनियाबी हलचलों से हर पल अवगत कराया। मैं इसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
अब रही बात इसके दुष्प्रभाव की, तो वो तो सुरा का भी आविष्कार दवा के लिए ही हुआ था, लेकिन हमने उसे नशे का सामान बना दिया। शादी तमाम कुरीतियों/अनैतिकताओं से समाज को बचाने के लिए ही की जाती है, लेकिन विवाहेतर संबंधों और वेश्यावृत्ति का घनत्व बढ़ता ही जा रहा है और साथ ही गे-लेस्बियन की कल्चर भी। हथियार भी आत्मरक्षा के लिए बने हैं लेकिन लोग उससे क़त्ल की सुपारी उठायें और डकैतियाँ डालें तो क्या कहा जा सकता है।
ख़ैर, मैं आदरपूर्वक ये बताना चाह रहा हूँ कि बहुत कम समय में सबसे ज़्यादा मुझे फेसबुक /सोशल मीडिया ने दिया। अपने फेसबुक मित्रों एवं सोशल मीडिया के सिलसिले में एक पद कहना चाहूँगा.....

चंद्रकांता - पंकज मिश्रा - आशुतोष हर रोज़ मिलें,
यहीं फेसबुक पर ही मेरे दरके दिल के तार सिलें,
और सहारा 'दिन प्रतिदिन' वाले का पा आशीष यहीं-
हृदय हर्ष से भर जाता है मन उपवन में फूल खिलें,
भट्ट ब्रदर-एमपी शर्मा-चंद्रा-कुंदन-धीरज से ले-
यहीं मिलें साधक-नीरव-मीणा - रजेश मंडार।
दयानिधि अब तो लो अवतार...!

मेरे पास बहुत लंबी फेहरिस्त (सूची) है मेरे फेसबुक मित्रों की, जिनका हमारे जीवन में किसी न किसी रूप में सकारात्मक योगदान है। क्षमापूर्वक कहना चाहता हूँ कि वो बुरा न माने जिनका नाम मैं यहाँ नहीं दे पाया, निश्चित ही उन सभी का नाम मैं धीरे-धीरे गिनवाऊँगा। ये पद तो मात्र एक बानगी (उदाहरण) है।

आख़िर में जाते जाते
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मित्रों आपके सब्र का और इम्तहान न लेते हुए सोच रहा हूँ कि बात 'बढ़' जाये इससे पहले ही बात को विराम दे दिया जाये, क्योंकि ऐसे रहा तो ये बातें कभी ख़त्म ही नहीं होगी। फिर भी जाते-जाते अपनी बातूनी फ़ितरत (आदत) के मुताबिक दो चार बातें और करके ही मानूँगा। मेरे लिए ज़िन्दगी वही है जो चल रही है, मैंने ग़ुरबत में भी मानवीय मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। मैं साहित्यिक आयोजनों में न के बराबर शिरकत करता हूँ। ज्यादातर लोग तो हमें हमारे अक्खड़ स्वभाव के कारण बुलाते ही नहीं और जो बुलाते हैं उनमें जाता नहीं। दरअसल ये साहित्यिक संगठन भी अलीबाबा गैंग की ही तरह हैं, जो पूरी तरह से सापेक्ष हैं। इनकी प्रवृत्ति भी वही है जैसे... "अन्धा बाँटे रेवड़ी घरै घराना देय. "* अत: मैं इन्हें कोई महत्व नहीं देता। क्योंकि ये सोच-समझकर इरादतन गोलबंदी करते हैं। मित्रों ये 575 (फाइव सेवन फाइव) पदों का महासंग्रह 2018 तैयार करने में हमने अपने पिछले छपे हुए चार संग्रहों के 800 (आठ सौ) पदों में से चार सौ पद लिए और उन्हें दोबारा लिखा तथा 175 (एक सौ पचहत्तर) नये इधर एक साल में लिखे गये पदों को मिलाकर इस ई_बुक का निर्माण हुआ। जिसका प्रिंटेड वर्जन भी इसी वर्ष आपके हाथों में होगा। इसमें हमने अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश की है। अब ये देखना है कि यह "दयानिधि महासंग्रह 2018" आपको कितना भाता है। हो सके तो अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा। ये पद फेसबुक पर भी उपलब्ध हैं। इस कार्य में पूरा एक वर्ष लगा। देखते हैं क्या परिणाम आता है।
मित्रों! आपकी प्रशंसा और साथ से जो दयानिधि......! की गंगोत्री छ: साल पहले 2012 में फूटी थी वो अब एक आबज़ू (नदी) की शक़्ल अख़्तियार कर चुकी है, ये आपकी ही दुआओं का असर है। इसके लेखन ने मुझे लगातार आत्मिक और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की, जिससे मैं अपनी कई शारीरिक, मानसिक, व्यावहारिक कमज़ोरियों पर क़ाबू पा सका और नयी राह बना सका।
प्रिय मित्रों! अब आपको रंज-वो-ग़म में डूबी क़ैद-ए-हयात (दुख-दर्द में डूबा जीवन) की चर्चा से निकाल अक़्ल के स्कूल से दूर इश्क़ के मैक़दे में ले चलता हूँ जहाँ केवल आप होंगे और ये *'दयानिधि अब तो लो अवतार...!'* के पद, तो फिर लीजिए पढ़ना शुरू कीजिए....फिर मिलते हैं अगले संग्रह के साथ, तब तक के लिए विदा, नमस्कार

आपका दोस्त
राजेश्वर राय 'दयानिधि'
बी-59, गरिमा गार्डन, साहिबाबाद ग़ाज़ियाबाद (उत्तर प्रदेश) 201005
मोबाइल: 8800201131/8800703800
व्हाट्सप: 9540276160
e_mail: rajeshwar.azm@gmail.com
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यू ट्यूब: 111 rajeshwar
Date: 10/05/2018

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