डाटला एक्सप्रेस के 'साहित्य सेतु' परिशिष्ट में पेश है सुनील पाण्डेय की एक चर्चित ग़ज़ल _____ साँसें
January 19, 2019 • Datla Express

साँसें
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जिंदगी जीने की पुरज़ोर लगन हैं साँसें,
किसी अल्फाज़ के हर लफ़्ज़ की फ़न हैं साँसें।

रेत की आँख जो शबनम-ए-ग़म बहा न सकीं,
उन्हीं बे - नूर निगाहों की जलन हैं साँसें।

तू मेरे ज़ख़्म से बेकार छेड़छाड़ न कर,
राज बनकर तेरी, सीने में दफ़न है साँसें।

रूह महसूस करूँ मैं , न तेरा जिस्म सही,
तेरे दामन, तेरी ख़ुशबू की चुभन हैं साँसें।

वक्त की बेरुख़ी ने जिनके पंख काट दिए,
उन परिंदों की आसमां में उड़न हैं साँसें।

हिज्र की रात में ग़म अपना और तेरा ख़याल,
तुझसे ख़ामोश गुफ़्तगू की सुखन है साँसें।

साँस-दर-साँस मुख़्तसर हयात होती है,
लोग कहते हैं कि पल-पल की कफ़न हैं साँसें।
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सुनील पांडेय
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