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जीडीए के सूचनाधिकारी सूचनाएं न देने में लगाते है सारा दिमाग़
April 30, 2019 • Datla Express

डाटला एक्सप्रेस
रोशन कुमार राय
datlaexpress@gmail.com


गाजियाबाद: हमारे देश की सर्वदा ये समस्या रही है कि हम दूसरों को उपदेश देने में तो आगे हैं परन्तु जब अपनी बारी आती है तो हम कोई सबक़ नहीं लेते। भ्रष्टाचार हटाने पर चर्चा करते हैं, पर उस चर्चा के लिए जो मीटिंग तक बुलायी जाती है उसमें होने वाले खर्च में भी भ्रष्टाचार करते हैं। एक कानून बनने पर उसे तोड़ने के सौ नुस्ख़े तैयार कर लेते हैं। एंटी करप्शन सेल करप्शन में करप्शन करने के लिए संचालित हो रहे हैं। उगाही नीचे से ऊपर मतलब उर्ध्वगामी और सरकारी धन की लूट ऊपर से नीचे यानि अधोगामी रूप से बदस्तूर जारी है। ख़ैर, इस बहस-मुबाहिशे में क्या रखा है ये तो रोज़ ही होता रहता है और परिणाम वही ढाक के तीन पात। इन्हीं तमाम चीजों पर थोड़ा अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार 2005 में सूचना का अधिकार कानून लायी थी, लेकिन इन बाबुओं और सूचना अधिकारियों ने उस कानून की ऐसी बैंड बजाई कि उसकी हवा ही निकल गयी और वो फुस्स हो गया और यह जनहित का कानून अब बस कागजों में सिमटकर अंतिम साँसें गिन रहा है।

ऐसे ही एक मामले कि बानगी देखिए जिसमें आवेदक पत्रकार राजेश्वर राय 'दयानिधि' द्वारा जनहित में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के प्रवर्तन जोन 02 से संबंधित निम्नलिखित 03 (तीन) बिदुओं पर आरटीआई क्रमांक 21053/26 मार्च 2019 के द्वारा सूचना माँगी जाती है.....

(1)-2018 में अवैध निर्माण के लिए जारी की गयीं नोटिसों की छायाप्रति सहित सूची।

(2)प्रवर्तन जोन 02 में नियुक्त प्रभारी/एई/जेई की नाम एवं पद-नाम सहित सूची।

(3)-2018 में ध्वस्त की गयीं इमारतों की सूची

अब आते हैं इसके जवाब पर, प्रथम प्रश्न के उत्तर में जीडीए प्रवर्तन जोन 02 का प्रभारी एवं सूचनाधिकारी जो अपना नाम बड़ी सफाई से चालाकी दिखाते हुए सूचना पत्र में नहीं लिखता, जवाब देता है कि "नियमानुसार शुल्क प्राधिकरण कोष में जमा कराकर किसी भी कार्य दिवस में आकर पत्रावलियों का निरीक्षण किया जा सकता है."


अब इसमें पेंच देखिए, माँगी गयी छायाप्रति और विद्वान सूचनाधिकारी अवलोकन करवा रहा है। एक तरफ शुल्क जमा कराने की बात कर रहा है जबकि पृष्ठों की संख्या, बैंक का नाम और खाता संख्या का उल्लेख दुराग्रहपूर्ण ढंग से नहीं करता। अब कार्य दिवस में अवलोकन पर आते हैं, वो ये कि आप जब भी जायेंगे तो संबंधित बाबू या अधिकारी आपको मिलेगा ही नहीं और यदि मिल गया तो आपको दूसरे दिन आने के आदेश के साथ चलता कर देगा। अब एक ज्वलंत बात जिस जीडीए प्राधिकरण स्थित कार्यालय पर बुलाने की बात की गयी है वहाँ की मौजूदा स्थिति ये है कि आप वहाँ पहुँच ही नहीं सकते, क्योंकि उपाध्याक्ष कंचन वर्मा ने उसे तालिबानी किले में तब्दील कर दिया है जहां किसी भी स्थिति में कोई प्रवेश ही नहीं कर सकता, इतनी लिखा-पढ़ी और पूछताछ बढ़ गयी है कि आदमी आजिज़ आकर अन्दर जाने का विचार ही त्याग देता है। रहा सवाल उपाध्यक्ष साहिबा की सख्ती के परिणाम का तो वो ये है कि एक भी अवैध निर्माण नहीं रुके हैं यानि सिफ़र।

अब उन कारण बताओ नोटिसों को न देने के उद्देश्य पर आयें तो वो ये है कि जिन निर्माणों को अवैध बताकर रोके जाने की धमकी नोटिस जारी करके दी गयीं वो तो बस उन निर्माणकर्ताओं से संपर्क साधने और उन्हें चढ़ावे लिए मजबूर करने की एक नियोजित प्रक्रिया है। अब भला अपना ही पोल खोलने के लिए कोई कैसे जानकारी दे सकता है,, क्योंकि आधिकारिक सूचना पर ये सारे अवैध निर्माण के संरक्षण अभियंता घिर जायेंगे। अब आते हैं द्वितीय प्रश्न के उत्तर पर जिसमें प्राधिकरण की वेबसाइट पर जोन में नियुक्त अभियंताओं की सूची प्राप्त करने की बात कही गयी है तो उसकी असलियत ये है कि वो अधूरी, बिखरी और अद्यतन है ही नहीं। अब तीसरे पक्ष के बारे में प्रश्न एक की तरह ही टाल दिया गया है यानि 2018 में डिमोलिश्ड इमारतों की जो सूची माँगी गयी है वो देने में हीला-हवाली करने का मुख्य कारण ये है कि काग़ज़ों में तो वो निर्माण ध्वस्त हैं परन्तु मौके पर कुछ के निर्माण जारी हैं तो कुछ के पूरे हो गये हैं। तो इस स्थिति में इतनी आसानी से सूचना देकर सूचनाधिकारी/जोन प्रभारी भला अपना चीरहरण क्यूँ करवायेगा। वैसे ये ख़बर है कि प्रभारी साहब क्षत्रिय हैं,उनकी लखनऊ के सत्ता के गलियारों में अच्छी पकड़ हैं, और हो भी क्यों न इस समय योगी सरकार में ठाकुरों की पौ वैसे ही बाहर है, इनका कोई बाल भी बाँका नहीं कर पा रहा है, सारे प्रशासन पर ये ही क़ाबिज़ हैं। इस समय ये चर्चा आम है कि 'यूपी में योगी के साँड़ों और उनके ठाकुरों से निपटना मुश्किल है'

अब ऐसी स्थिति में प्रार्थी राजेश्वर राय ने प्रथम अपील दाखिल करने का निर्णय लिया है और कहा है कि भले ही उन्हें राज्य सूचना आयोग या न्यायालय तक क्यों न जाना पड़े वो सूचना ले के ही रहेंगे। अब सवाल ये उठता है कि क्या जीडीए के सूचनाधिकारी ऐसे ही सूचनाधिकार कानून का मज़ाक उड़ाते रहेंगे या उन पर कोई नकेल भी कसी जायेगी जिससे नैसर्गिक न्याय की कुछ उम्मीद दिखे।