गुरूजी महादेवी वर्मा, यादों के झरोखे से: यास्मीन सुल्ताना नक़वी  (प्रथम क़िश्त)
August 10, 2019 • Datla Express

आज नयन क्यूँ भर-भर आये
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जीवन के प्रत्येक पड़ाव में सबसे सुखद और सुंदर पड़ाव होता है, "छात्र जीवन"।
हमारे छात्र जीवन में प्रतिदिन की दो कक्षाएँ ऐसी थीं जो बहुत ही महत्वपूर्ण थीं; वह थीं 1975 से 1978 की महादेवी जी की। उनकी कक्षा भयभीत करने वाली नहीं होती थी, अपितु प्रत्येक विषय के लिए सहजता प्राप्त होती रहती थी। वे हँसतीं तो जी भर कर थीं लेकिन उस हँसी में विषय दब नहीं पाता था चाहे जितनी देर हँसती रहें, हँसने के बाद अपनी बात जरूर पूरी करती थीं। हँसने का आनंद उन्होंने जितना लिया है शायद ही दूसरा कोई साहित्यकार प्राप्त करने में सफल रहा हो। इसी आधार पर उनकी कक्षा भरी रहती थी। महादेवी जी का व्यवहार इतना अच्छा था कि मैं ही क्या,मेरे परिवार के अन्य सदस्य भी बड़े शौक से उनके यहाँ जाते थे। गुरूजी (महादेवी जी को सब गुरूजी कहते थे) स्नेह पूर्वक सबसे मिलती थीं। उनके मुस्कुराते हुए चेहरे पर कुसुम की कोमलता की परतें भी चढ़ी रहतीं जिसमें सभी खो जाते थे। उनके सम्मोहन का जादू सब पर चढ़ जाता था। महादेवी जी की ममता की महक और आशीष रूपी ज्योति किरन को मैंने बहुत पास से देखा है। उसी आंच की ताप से मेरा शरीर तपा है। उनके चेहरे की लालिमा हमारे लिए शक्तिवर्धक सेब और अनार से करोड़ों गुना अधिक थी। उनका सुर्ख़ चेहरा खुशी की किताब होती था। मुझे याद है, एक बार वह बहुत अधिक थक गई थीं जिससे उनका चेहरे कुम्हला गया और माथे पे पसीना ही पसीना। कुम्हलाए हुए होठ काले पड़ गए, पपड़ी दिखने लगी। मैं अंदर ही अंदर परेशान हो गई। बाद में गीता ने मुझे बताया कि सुबह से ही लोग मिलने आ रहे हैं , और लगातार तब से गुरूजी बैठी ही हैं।

स्व. पी. डी. टण्डन जी ने अपने घर 04 एलगिन रोड में एक लोटा दिखाया जो कई जगह से टूटा हुआ था। मुझे बताने लगे कि महादेवी जी जब राखी बांधने आती थीं तो कोई अनमोल उपहार अपनी चित्रकारी या पत्थरों पर तराशी गई कोई चीज साथ लाती थीं। ये लोटा उन्ही का बनाया हुआ है। टण्डन जी ने एक गुलाब का फूल भी दिखाया जो संगमरमर पर बना था। गुरुजी ने उसे नाखून काटने की नहन्नी से बनाया था। उनकी मूर्तिकला लोगों के सामने बहुत आई थी। उनकी चित्रकला का रूप-  रँग यामा के माध्यम से लोगों ने अनेक रूपों में देखा है। भारत में सुरक्षित रखने के लिए बहुत कुछ है किंतु हमें अपनी धरोहर को संभालने की कला नहीं मालूम है।

क्रमशः.....
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[महादेवी वर्मा जी के जीवन के अन्तिम सत्तरह वर्षों में उनकी ख़िदमत में रहीं उनकी शिष्या डॉक्टर यास्मीन सुल्ताना नक़वी (प्रयागराज/उत्तर प्रदेश) से कवयित्री ममता शर्मा 'अंचल'(अलवर/राजस्थान) की लम्बी बातचीत में उनके द्वारा सुनाये गये संस्मरणों के आधार पर। प्रस्तुति: डाटला एक्सप्रेस]

डॉक्टर यास्मीन सुल्ताना नक़वी (प्रयागराज/उत्तर प्रदेश)

 

डाटला एक्सप्रेस
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