(1) राज राजेश्वर के चुनिंदा 15 अश'आर: मुसाफ़िर... संग्रह से 
August 30, 2019 • Datla Express

 


इक  ख़त्म  हुई  दूसरी  आ  जाती है बला
ये ज़िन्दगी है, या है हादसों का सिलसिला (1)
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हसीनाओं  के  क़दमों  में  मेरी  हस्ती  नहीं गिरती
मैं परवाना हूँ वो, जिसको शमां ख़ुद ढूँढ़ती फिरती (2)
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तू जब तक थी मैं ख़ुद को तिफ़्ल से ज़्यादा नहीं पाया
तेरे  जाते  ही  माँ  मुझ  में   ज़ईफ़ी  आ   गयी पल में (3)
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ये वो जहां है जिसने फरिश्तों को नहीं बख़्शा
हमदर्दी  की  हम  इससे  उम्मीद  नहीं  रखते (4)
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वफ़ाओं की तेरी बदली सनम कुछ पल बरसती है
मगर  अफ़सोस  मेरी  छत महीनों तक टपकती है (5)
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तुम्हारे प्यार का क़र्ज़ा सनम मुझपे बक़ाया है
तग़ादा ना किया तुमने, न मैंने ख़ुद चुकाया है (6)
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बिना  पूछे  ही  जो  मेरा  पता  ख़ुद. ढूँढ़ लेते थे
बताने पे भी अब उनको हमारा घर नहीं मिलता (7)
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जिन  पे  लुटा दीं हमने, सारी अशर्फ़ियाँ
वो ही पलट के हमको फ़क़ीर कह रहे हैं (8)
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मुझे  डरपोक  कहते  हो तेरा कहना बेमानी है
जिसे डर कह रहे हो तुम, वो मेरी सावधानी है (9)
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बहुत आज़ाद हूँ फ़िर क़ैद करलो ज़ुल्फ़वालों तुम
इसी में क़ैद होने से.............मेरी सच्ची रिहाई है (10)
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तेरी  यादों  को  हमने ज़िन्दगी ग़ज़लों में ढारी है
यही सेविंग, यही रिकरिंग, यही एफडी हमारी है (11)
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क़ीमत लगी तो बिक नहीं सका मैं ऐंठ में
अब  ये  मलाल  है  कि  कोई पूछता नहीं (12)
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मैख़ाना चलता-फिरता देखा पहली बार है
हरेक  अंग  में  उनके  नशे का कारोबार है (13)
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ग़ज़ल थी पुरअसर मेरी, मगर ये नाज़ ना पाई
कभी  ये  साज़ ना पाई, कभी आवाज़ ना पाई (14)
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ना  जाने  आज कैसी मोहब्बत का दौर है
बाहों में कोई और तसव्वुर में कोई और है (15)
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राज राजेश्वर/8800201131